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दोष जो पित्तरों से सम्बन्धित होता हैवह दोष जो पित्तरों से सम्बन्धित होता है पितृदोष कहलाता है। यहाँ पितृ का अर्थ पिता नहीं वरन् पूर्वज होता है। ये वह पूर्वज होते है जो मुक्ति प्राप्त ना होने के कारण पितृलोक में रहते है तथा अपने प्रियजनों से उन्हे विशेष स्नेह रहता है। श्राद्ध या अन्य धार्मिक कर्मकाण्ड ना किये जाने के कारण या अन्य किसी कारणवश रूष्ट हो जाये तो उसे पितृ दोष कहते है।विश्व के लगभग सभी धर्मों में यह माना गया है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति की देह का तो नाश हो जाता है लेकिन उनकी आत्मा कभी भी नहीं मरती है। पवित्र गीता के अनुसार जिस प्रकार स्नान के पश्चात् हम नवीन वस्त्र धारण करते है उसी प्रकार यह आत्मा भी मृत्यु के बाद एक देह को छोड़कर नवीन देह धारण करती है।हमारे पित्तरों को भी सामान्य मनुष्यों की तरह सुख दुख मोह ममता भूख प्यास आदि का अनुभव होता है। यदि पितृ योनि में गये व्यक्ति के लिये उसके परिवार के लोग श्राद्ध कर्म तथा श्रद्धा का भाव नहीं रखते है तो वह पित्तर अपने प्रियजनों से नाराज हो जाते है।पित्तरों के पास आलौकिक शक्तियां होती हैसमान्यतः इन पित्तरों के पास आलौकिक शक्तियां होती है तथा यह अपने परिजनों एवं वंशजों की सफलता सुख समृद्धि के लिये चिन्तित रहते है जब इनके प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक कर्म नहीं किये जाते है तो यह निर्बलता का अनुभव करते है तथा चाहकर भी अपने परिवार की सहायता नहीं कर पाते है तथा यदि यह नाराज हो गये तो इनके परिजनों को तमाम कठनाइयों का सामना करना पड़ता है।पितृ दोष होने पर व्यक्तिपितृ दोष होने पर व्यक्ति को जीवन में तमाम तरह की परेशानियां उठानी पड़ती है जैसे घर में सदस्यों का बिमार रहना मानसिक परेशानी सन्तान का ना होना कन्या का अधिक होना या पुत्र का ना होना पारिवारिक सदस्यों में वैचारिक मतभेद होना जीविकोपार्जन में अस्थिरता या पर्याप्त आमदनी होने पर भी धन का ना रूकना प्रत्येक कार्य में अचानक रूकावटें आना सर पर कर्ज का भार होना सफलता के करीब पहुँचकर भी असफल हो जाना प्रयास करने पर भी मनवांछित फल का ना मिलना आकस्मिक दुर्घटना की आशंका तथा वृद्धावस्था में बहुत दुख प्राप्त होना आदि। बहुत से लोगों की कुण्डली में कालसर्प योग भी देखा जाता है वस्तुतः कालसर्प योग भी पितृ दोष के कारण ही होता जिसकी वजह से मनुष्य के जीवन में तमाम मुसीबतों एवं अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।⇐तर्पण का महत्वहिन्दु धर्म शास्त्रों में- वसु, आदित्य और रुद्र इन तीन देवताओं को क्रमशः पितृ, पितामह और प्रपितामह का पोषण प्रतिनिधि माना है। हमारे विवाह में भी गात्रोच्चारण में पितृ, पितामह, प्रपितामह इन तीनों का ही उल्लेख होता है।येन पितुः पितरो ये पितामहास्तेभ्यः पितृभ्योनमसा विधेम।अर्थात्‌ पितृ, पितामह, प्रपितामाहों को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं।त्रयाणामुदकं कार्य त्रिषु पिंडः प्रवर्तते।चतुर्थः सम्प्रदातैषां पंचमो नापि विद्यते॥अर्थात्‌ पिता, पितामह और प्रपितामह इन तीनों का श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान होता है। चौथा श्राद्धकर्ता स्वयं यजमान होता है, और यहाँ पर पाँचवें की कोई सम्भावना ही नहीं है।तिल और पानी की जलांजली के माध्यम से हम अपने पित्रों को संतुष्ट करते हुए उनको और ऊंचे स्तर पर पहुंचा सकते हैं।तर्पण में हम उन्हें मंत्रों के साथ पानी और तिल की पेशकश करते हैं तर्पण जो उन्हें बहुत पसंद है और वह शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते है ।महाभारत,आदि पर्व, 74.39 मे लिखा हैपुन्नाम्नॊ नरकादयस्मात्पितरम् त्रायते सुत:तस्मात्पुत्र इति प्रॊक्त: स्वयमॆव स्वयम्भुवाबेटा पिता को पुत नाम का नरक से बचाता है,इसलिए उसे स्वयंभु भगवान ने पुत्र नाम रखा था।हमारे पूर्वजों की मौत के बाद हमें उनकी आगे की यात्रा के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, वे कहाँ, किस रूप में है, उन्होंने जन्म लिया है या नहीं, जन्म लिए है तो कहाँ किसी को कुछ भी पता नहीं होता है, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है की हम उन्हें जीवित भी खुश रखें और उनकी मृत्यु के बाद भी। पितृ तर्पण एक अद्भुत मौका है जिसमें देवताओं, वसु, रुद्र और आदित्य,चाहे हमारे पितृ किधर भी किसी भी रूप में हो, उनको सूक्ष्म माध्यम से हमारे जल और तिल को पित्रों के पास उत्तम रूप मे पहुंचा देते हैं।चूँकि पितरों को भी पोषण की जरूरत है। इसलिए जब हम उनको तर्पण देते हैं,वे संतुष्ट हो जाते हैं और हमें सुख,दौलत और सत संतति की आशीर्वाद देते हैं। और जब वे अच्छाई करते हैं,तब उसके हिसाब से उनको भी ऊंचाई मिल जाती है।तर्पण करने से पहले कुछ भी नहीं खाना चाहिए. उस दिन के रात में, किसी भी उपवास खाना खाना चाहिए|वैसे ही तिथि के पहले दिन की रात मे भी उपवास का खाना लेना है।प्रतिदिन तर्पण के दिन की सुबह में गीले किए हुये और सूखे धोती / कपड़ा पहनना चाहिए. यदि संभव हो तो पिछली रात मे धोती को धो के एक स्थान पर लटकाए जिधर कोई नहीं छुए।तर्पण करने से व्यक्ति के जन्म के आरंभ से तर्पण के दिन तक जाने अनजाने किए गए पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं।"समयानुसार श्राद्ध, तर्पण करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।"पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। तर्पण करते समय एक पीतल के बर्तन में जल में गंगाजल , कच्चा दूध, तिल, जौ, तुलसी के पत्ते, दूब, शहद और सफेद फूल आदि डाल कर फिर एक लोटे से पहले देवताओं, ऋषियों, और सबसे बाद में पितरों का तर्पण करना चाहिए।कुश तथा काला तिल भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं तथा चांदी भगवान शिव के नेत्रों से प्रकट हुई हैं। गाय का दूध और गंगाजल का प्रयोग श्राद्ध के कर्मफल को कई गुना तक बढ़ा देता है। तुलसी बहुत ही पवित्र मानी जाती है अत: इसके प्रयोग से पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं।तर्पण में कुशा (पवित्री) का प्रयोग अनिवार्य है। दो कुशा से बनाई हुई पवित्री (अंगूठी) दा‍हिने हाथ की अनामिका अंगुली तथा तीन कुशाओं से मिलाकर बनाई गई पवित्री बाईं अनामिका में धारण करें, यह आप खुद भी बना सकते या बाज़ार में किसी भी पूजा की दुकान में मिल जाता है।पितरों के तर्पण में सोना-चांदी, कांसा या तांबे के पात्र का ही उपयोग करना चाहिए। लेकिन लौह के पात्र अशुद्ध माने गए हैं। अत: यथासंभव लोहे के बर्तनो का प्रयोग नहीं ही करना चाहिए ।तर्पण, श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर देवताओं का तर्पण करते समय पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके देवताओं का नाम लेकर एक एक बार तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।ऋषियों का तर्पण करते समय उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके दो बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली के दोनों तरफ से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।इसके पश्चात दक्षिण दिशा की तरफ मुँह करके सबसे पहले भगवान यमराज फिर चित्रगुप्त का नाम लेते हुए और उसके बाद अपने सभी पितरों का नाम लेते हुए सबके नाम के बाद तीन बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि, कहकर पितृ तीर्थ यानी अँगूठे के बगल की उँगली और अंगूठे के बीच से जलांजलि देते हुए जल को धरती में किसी बर्तन में छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है।तर्पण करते समय पहले अपने ददिहाल के सभी पितरों उसके बाद अपने ननिहाल के सभी पितरों का नाम लेते हुए उनका तर्पण करें, फिर अपने वंश के भूले हुए, पितृ जिन तक आपका तर्पण पहुँचना चाहिए उन सभी पितरों को एक साथ जलांजलि देते हुए उनका तर्पण करें ।अंत में पूर्व की ओर मुंह करके शुद्ध जल से सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें।ध्यान रहे तर्पण का जल तर्पण के बाद किसी वृक्ष की जड़ में चड़ा देना चाहिए वह जल इधर उधर बहाना नहीं चाहिए ।हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक शहद , डेढ़ प्रहर तक दूध और साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त होता है। अत: हमें सुबह सवेरे ही तर्पण करना चाहिए ।हमारे पूर्वज अपने वंशजों से अपने प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं स्मरण की अपेक्षा रखते है । और यह सभी व्यक्तियों का अनिवार्य कर्तव्य है कि वह अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यों का निश्चित ही पालन करें । जिस भी व्यक्ति के माता पिता जीवित है यह उसका दायित्व है कि वह अपने माता पिता को उनके पूर्वजों के प्रति किये जाने वाले कर्मों के बारे में बताये । याद रखिये यदि कोई व्यक्ति जान बूझ कर अपने पूर्वजों का श्राद्ध, पितृ पक्ष में प्रतिदिन तर्पण नहीं करता है तो वह घोर नरक का भागी होता है, और जिस भी व्यक्ति को इन कर्म कांडों के बारे में ज्ञान है लेकिन वह अन्य लोगो को इसके बारे में नहीं बताते है वह भी पाप के भागी होते है । अत: यह हम सभी की जिम्मेदारी है की हम समाज के सभी लोगो को पितरों के प्रति कर्तव्यों के बारे में अवश्य ही बताएं ।

दोष जो पित्तरों से सम्बन्धित होता है

वह दोष जो पित्तरों से सम्बन्धित होता है पितृदोष कहलाता है। यहाँ पितृ का अर्थ पिता नहीं वरन् पूर्वज होता है। ये वह पूर्वज होते है जो मुक्ति प्राप्त ना होने के कारण पितृलोक में रहते है तथा अपने प्रियजनों से उन्हे विशेष स्नेह रहता है। श्राद्ध या अन्य धार्मिक कर्मकाण्ड ना किये जाने के कारण या अन्य किसी कारणवश रूष्ट हो जाये तो उसे पितृ दोष कहते है।

विश्व के लगभग सभी धर्मों में यह माना गया है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति की देह का तो नाश हो जाता है लेकिन उनकी आत्मा कभी भी नहीं मरती है। पवित्र गीता के अनुसार जिस प्रकार स्नान के पश्चात् हम नवीन वस्त्र धारण करते है उसी प्रकार यह आत्मा भी मृत्यु के बाद एक देह को छोड़कर नवीन देह धारण करती है।

हमारे पित्तरों को भी सामान्य मनुष्यों की तरह सुख दुख मोह ममता भूख प्यास आदि का अनुभव होता है। यदि पितृ योनि में गये व्यक्ति के लिये उसके परिवार के लोग श्राद्ध कर्म तथा श्रद्धा का भाव नहीं रखते है तो वह पित्तर अपने प्रियजनों से नाराज हो जाते है।

पित्तरों के पास आलौकिक शक्तियां होती है

समान्यतः इन पित्तरों के पास आलौकिक शक्तियां होती है तथा यह अपने परिजनों एवं वंशजों की सफलता सुख समृद्धि के लिये चिन्तित रहते है जब इनके प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक कर्म नहीं किये जाते है तो यह निर्बलता का अनुभव करते है तथा चाहकर भी अपने परिवार की सहायता नहीं कर पाते है तथा यदि यह नाराज हो गये तो इनके परिजनों को तमाम कठनाइयों का सामना करना पड़ता है।


पितृ दोष होने पर व्यक्ति

पितृ दोष होने पर व्यक्ति को जीवन में तमाम तरह की परेशानियां उठानी पड़ती है जैसे घर में सदस्यों का बिमार रहना मानसिक परेशानी सन्तान का ना होना कन्या का अधिक होना या पुत्र का ना होना पारिवारिक सदस्यों में वैचारिक मतभेद होना जीविकोपार्जन में अस्थिरता या पर्याप्त आमदनी होने पर भी धन का ना रूकना प्रत्येक कार्य में अचानक रूकावटें आना सर पर कर्ज का भार होना सफलता के करीब पहुँचकर भी असफल हो जाना प्रयास करने पर भी मनवांछित फल का ना मिलना आकस्मिक दुर्घटना की आशंका तथा वृद्धावस्था में बहुत दुख प्राप्त होना आदि। बहुत से लोगों की कुण्डली में कालसर्प योग भी देखा जाता है वस्तुतः कालसर्प योग भी पितृ दोष के कारण ही होता जिसकी वजह से मनुष्य के जीवन में तमाम मुसीबतों एवं अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।

तर्पण का महत्व

हिन्दु धर्म शास्त्रों में- वसु, आदित्य और रुद्र इन तीन देवताओं को क्रमशः पितृ, पितामह और प्रपितामह का पोषण प्रतिनिधि माना है। हमारे विवाह में भी गात्रोच्चारण में पितृ, पितामह, प्रपितामह इन तीनों का ही उल्लेख होता है।

येन पितुः पितरो ये पितामहास्तेभ्यः पितृभ्योनमसा विधेम।

अर्थात्‌ पितृ, पितामह, प्रपितामाहों को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं।

त्रयाणामुदकं कार्य त्रिषु पिंडः प्रवर्तते।
चतुर्थः सम्प्रदातैषां पंचमो नापि विद्यते॥

अर्थात्‌ पिता, पितामह और प्रपितामह इन तीनों का श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान होता है। चौथा श्राद्धकर्ता स्वयं यजमान होता है, और यहाँ पर पाँचवें की कोई सम्भावना ही नहीं है।

तिल और पानी की जलांजली के माध्यम से हम अपने पित्रों को संतुष्ट करते हुए उनको और ऊंचे स्तर पर पहुंचा सकते हैं।
तर्पण में हम उन्हें मंत्रों के साथ पानी और तिल की पेशकश करते हैं तर्पण जो उन्हें बहुत पसंद है और वह शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते है ।
महाभारत,आदि पर्व, 74.39 मे लिखा है

पुन्नाम्नॊ नरकादयस्मात्पितरम् त्रायते सुत:
तस्मात्पुत्र इति प्रॊक्त: स्वयमॆव स्वयम्भुवा

बेटा पिता को पुत नाम का नरक से बचाता है,इसलिए उसे स्वयंभु भगवान ने पुत्र नाम रखा था।

हमारे पूर्वजों की मौत के बाद हमें उनकी आगे की यात्रा के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, वे कहाँ, किस रूप में है, उन्होंने जन्म लिया है या नहीं, जन्म लिए है तो कहाँ किसी को कुछ भी पता नहीं होता है, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है की हम उन्हें जीवित भी खुश रखें और उनकी मृत्यु के बाद भी। पितृ तर्पण एक अद्भुत मौका है जिसमें देवताओं, वसु, रुद्र और आदित्य,चाहे हमारे पितृ किधर भी किसी भी रूप में हो, उनको सूक्ष्म माध्यम से हमारे जल और तिल को पित्रों के पास उत्तम रूप मे पहुंचा देते हैं।

चूँकि पितरों को भी पोषण की जरूरत है। इसलिए जब हम उनको तर्पण देते हैं,वे संतुष्ट हो जाते हैं और हमें सुख,दौलत और सत संतति की आशीर्वाद देते हैं। और जब वे अच्छाई करते हैं,तब उसके हिसाब से उनको भी ऊंचाई मिल जाती है।

तर्पण करने से पहले कुछ भी नहीं खाना चाहिए. उस दिन के रात में, किसी भी उपवास खाना खाना चाहिए|वैसे ही तिथि के पहले दिन की रात मे भी उपवास का खाना लेना है।
प्रतिदिन तर्पण के दिन की सुबह में गीले किए हुये और सूखे धोती / कपड़ा पहनना चाहिए. यदि संभव हो तो पिछली रात मे धोती को धो के एक स्थान पर लटकाए जिधर कोई नहीं छुए।

तर्पण करने से व्यक्ति के जन्म के आरंभ से तर्पण के दिन तक जाने अनजाने किए गए पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं।

"समयानुसार श्राद्ध, तर्पण करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।"

पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। तर्पण करते समय एक पीतल के बर्तन में जल में गंगाजल , कच्चा दूध, तिल, जौ, तुलसी के पत्ते, दूब, शहद और सफेद फूल आदि डाल कर फिर एक लोटे से पहले देवताओं, ऋषियों, और सबसे बाद में पितरों का तर्पण करना चाहिए।

कुश तथा काला तिल भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं तथा चांदी भगवान शिव के नेत्रों से प्रकट हुई हैं। गाय का दूध और गंगाजल का प्रयोग श्राद्ध के कर्मफल को कई गुना तक बढ़ा देता है। तुलसी बहुत ही पवित्र मानी जाती है अत: इसके प्रयोग से पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

तर्पण में कुशा (पवित्री) का प्रयोग अनिवार्य है। दो कुशा से बनाई हुई पवित्री (अंगूठी) दा‍हिने हाथ की अनामिका अंगुली तथा तीन कुशाओं से मिलाकर बनाई गई पवित्री बाईं अनामिका में धारण करें, यह आप खुद भी बना सकते या बाज़ार में किसी भी पूजा की दुकान में मिल जाता है।

पितरों के तर्पण में सोना-चांदी, कांसा या तांबे के पात्र का ही उपयोग करना चाहिए। लेकिन लौह के पात्र अशुद्ध माने गए हैं। अत: यथासंभव लोहे के बर्तनो का प्रयोग नहीं ही करना चाहिए ।

तर्पण, श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर देवताओं का तर्पण करते समय पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके देवताओं का नाम लेकर एक एक बार तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।

ऋषियों का तर्पण करते समय उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके दो बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली के दोनों तरफ से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।

इसके पश्चात दक्षिण दिशा की तरफ मुँह करके सबसे पहले भगवान यमराज फिर चित्रगुप्त का नाम लेते हुए और उसके बाद अपने सभी पितरों का नाम लेते हुए सबके नाम के बाद तीन बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि,  कहकर पितृ तीर्थ यानी अँगूठे के बगल की उँगली और अंगूठे के बीच से जलांजलि देते हुए जल को धरती में किसी बर्तन में छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है।
तर्पण करते समय पहले अपने ददिहाल के सभी पितरों उसके बाद अपने ननिहाल के सभी पितरों का नाम लेते हुए उनका तर्पण करें, फिर अपने वंश के भूले हुए, पितृ जिन तक आपका तर्पण पहुँचना चाहिए उन सभी पितरों को एक साथ जलांजलि देते हुए उनका तर्पण करें ।

अंत में पूर्व की ओर मुंह करके शुद्ध जल से सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें।
ध्यान रहे तर्पण का जल तर्पण के बाद किसी वृक्ष की जड़ में चड़ा देना चाहिए वह जल इधर उधर बहाना नहीं चाहिए ।

हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक शहद , डेढ़ प्रहर तक दूध और साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त होता है। अत: हमें सुबह सवेरे ही तर्पण करना चाहिए ।

हमारे पूर्वज अपने वंशजों से अपने प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं स्मरण की अपेक्षा रखते है । और यह सभी व्यक्तियों का अनिवार्य कर्तव्य है कि वह अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यों का निश्चित ही पालन करें । जिस भी व्यक्ति के माता पिता जीवित है यह उसका दायित्व है कि वह अपने माता पिता को उनके पूर्वजों के प्रति किये जाने वाले कर्मों के बारे में बताये । याद रखिये यदि कोई व्यक्ति जान बूझ कर अपने पूर्वजों का श्राद्ध, पितृ पक्ष में प्रतिदिन तर्पण नहीं करता है तो वह घोर नरक का भागी होता है, और जिस भी व्यक्ति को इन कर्म कांडों के बारे में ज्ञान है लेकिन वह अन्य लोगो को इसके बारे में नहीं बताते है वह भी पाप के भागी होते है । अत: यह हम सभी की जिम्मेदारी है की हम समाज के सभी लोगो को पितरों के प्रति कर्तव्यों के बारे में अवश्य ही बताएं ।

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पुनीत एवं अनिवार्य कर्त्तव्यश्राद्ध की तिथि में इस बात का भान रहे कि आपके पित्तर किसी ना किसी रूप में स्वयं उपस्थित हैं तथा आपका उनके निमित्त श्रद्धा से किये गये कर्म से वह अवश्य ही संतुष्ट होंगे तथा आपको आशीर्वाद देंगे लेकिन अगर हमने उनके प्रति आभार कृत्तज्ञता एवं श्राद्ध कर्म नहीं किया तो वह फिर पूरे वर्ष निराशा, बेचैनी, निर्बलता एवं दुख का अनुभव करेंगे। शास्त्रों में भी श्राद्ध कर्म को हर हिन्दू का पुनीत एवं अनिवार्य कर्त्तव्य बताया गया है।ब्रह्म वैवर्त पुराण और मनुस्मृतिब्रह्म वैवर्त पुराण और मनुस्मृति में ऐसे लोगों की घोर भत्र्सना की गई है जो इस मृत्युलोक में आकर अपने पितरों को भूल जाते हैं और सांसारिक मोहमाया, अज्ञानतावश अथवा संस्कार हीनता के कारण कभी भी अपने दिव्य पितरों को याद नहीं करते है।अपने पितरों का तिथि अनुसार श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होकर अनुष्ठाता की आयु को बढ़ा देते हैं। साथ ही धन धान्य, पुत्र-पौत्र तथा यश प्रदान करते हैं। श्राद्ध चंद्रिका में कर्म पुराण के माध्यम से वर्णन है कि मनुष्य के लिए श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याण कर वस्तु है ही नहीं इसलिए हर समझदार मनुष्य को पूर्ण श्रद्धा से श्राद्ध का अनुष्ठान अवश्य ही करना चाहिए। स्कन्द पुराण स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि श्राद्ध की कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं जाती, अतएव श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।श्राद्ध पक्ष में राहुकाल में तर्पणश्राद्ध पक्ष में राहुकाल में तर्पण, श्राद्ध वर्जित है अत: इस समय में उपरोक्त कार्य नहीं करने चाहिए ।श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन गजछाया के ( मध्यान का समय ) दौरान किया जाये तो अति उत्तम है ! गजछाया दिन में 12 बजे से 2 बजे के मध्य रहती है । सुबह अथवा 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक कतई नही पहॅंचता है। यह सिर्फ रस्मअदायगी मात्र ही है ।श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर की रसोई में बनाना चाहिए, जिसमें उड़द की दाल, बडे, दूध-घी से बने पकवान, चावल, खीर, बेल पर लगने वाली मौसमी सब्जीयाँ जैसे- लौकी, तोरई, भिण्डी, सीताफल, कच्चे केले की सब्जी ही बनानी चाहिए । आलू, मूली, बैंगन, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियाँ पितरो के श्राद्ध के दिन नहीं बनाई जाती हैं। पितरों को खीर बहुत पसंद होती है इसलिए उनके श्राद्ध के दिन और प्रत्येक माह की अमावस्या को खीर बनाकर ब्राह्मण को भोजन के साथ खिलाने पर महान पुण्य की प्राप्ति होती है, जीवन से अस्थिरताएँ दूर होती है ।श्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध के समयश्राद्ध पक्ष में पितरों के श्राद्ध के समय शास्त्रानुसार कुछ विशेष वस्तुओं और सामग्री का उपयोग उचित और कुछ को निषेध बताया गया है।1- श्राद्ध में सात पदार्थ बहुत ही महत्वपूर्ण बताए गए हैं जैसे - गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल।2- शास्त्रों के अनुसार, तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं, और श्राद्ध के पश्चात गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं। ।3 - श्राद्ध में भोजन में सोने, चांदी कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल का भी प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन लोहे अथवा स्टील के बर्तनों का उपयोग नहीं करना चाहिए |4 - रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। इसमें कुश के आसान को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है ।5 - आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।6 - श्राद्ध में केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन करना निषेध है।7 - चना, मसूर, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।8 - वृहत्पराशर में श्राद्ध की अवधि में मांस भक्षण, क्रोध, हिंसा, अनैतिक कार्य एवं स्त्री से शारीरिक सम्बन्ध, मैथुन कार्य आदि का निषेध बताया गया है। कहते है की इस अवधि में मैथुन करने से पितरों को वीर्यपान करना पड़ता है जिससे उन्हें बेहद कष्ट मिलता है अत: पितृ पक्ष में व्यक्ति को सयंम अवश्य ही बरतना चाहिए ।पित्तर पक्ष में स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति के लिये तर्पण किया जाता है। कहते है इसे गृहण करने के लिये पित्तर पितृ पक्ष में अपने वंशजों के द्वार पर आस लगाये रहते है। तर्पण में पित्तरों को अर्पण किये जाने वाले जल में दूध, जौ, चावल, तिल, चन्दन, फूल मिलाये जाते है।पितृ तर्पण उसी तिथि को किया जाता हैपितृ तर्पण उसी तिथि को किया जाता है जिस तिथि को पूर्वजों का देहान्त हुआ हो जिन्हें पूर्वजों की मृत्यु की तिथि याद ना हो वह अश्विन कृष्ण अमावस्या यानि सर्वपितृमोक्ष अमावस्या को यह कार्य करते है ताकि पित्तरों को मोक्ष मार्ग दिखाया जा सके। पितृ पक्ष की नौवी तिथि जिसे मातृ नवमी भी कहते है को सुहागन महिलाओं का श्राद्ध एवं तर्पण करना चाहिए।वैसे यदि हो सके तो पूरे पितृ पक्ष में हमें अपने पित्तरों को नमन करते हुये जल में अक्षत, मीठा, चन्दन, जौ, तिल एवं फूल डालकर श्रद्धापूर्वक तर्पण करना चाहिए।कहते है पितृ पक्ष में पित्तरों के निमित उनके गोत्र तथा नाम का उच्चारण करके जो भी वस्तुएं उन्हे अर्पित की जाती है वह उन्हें उनकी योनि के हिसाब से प्राप्त होती है पित्तर योनि पर सूक्ष्म द्रव्य रूप में, देव लोक में होने पर अमृत रूप में, गन्धर्व लोक में होने पर भोग्य रूप में, पशु योनि में तृण रूप में, सर्प योनि में वायु रूप में ,यक्ष योनि में पेय रूप में, दानव योनि में माँस रूप में, प्रेत योनि में रूधिर रूप में, तथा पित्तर मनुष्य योनि में हो तो उन्हे अन्न धन आदि के रूप में प्राप्त होता है।

पुनीत एवं अनिवार्य कर्त्तव्य श्राद्ध की तिथि में इस बात का भान रहे कि आपके पित्तर किसी ना किसी रूप में स्वयं उपस्थित हैं तथा आपका उनके निमित्त श्रद्धा से किये गये कर्म से वह अवश्य ही संतुष्ट होंगे तथा आपको आशीर्वाद देंगे लेकिन अगर हमने उनके प्रति आभार कृत्तज्ञता एवं श्राद्ध कर्म नहीं किया तो वह फिर पूरे वर्ष निराशा, बेचैनी, निर्बलता एवं दुख का अनुभव करेंगे। शास्त्रों में भी श्राद्ध कर्म को हर हिन्दू का पुनीत एवं अनिवार्य कर्त्तव्य बताया गया है। ब्रह्म वैवर्त पुराण और मनुस्मृति ब्रह्म वैवर्त पुराण और मनुस्मृति में ऐसे लोगों की घोर भत्र्सना की गई है जो इस मृत्युलोक में आकर अपने पितरों को भूल जाते हैं और सांसारिक मोहमाया, अज्ञानतावश अथवा संस्कार हीनता के कारण कभी भी अपने दिव्य पितरों को याद नहीं करते है। अपने पितरों का तिथि अनुसार श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होकर अनुष्ठाता की आयु को बढ़ा देते हैं। साथ ही धन धान्य, पुत्र-पौत्र तथा यश प्रदान करते हैं। श्राद्ध चंद्रिका में कर्म पुराण के माध्यम से वर्णन है कि मनुष्य के लिए श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याण कर वस्तु है ही नहीं इसलिए ...

दान ना देना आदि पितृ दोष के कारण बनते हैवर्तमान समय में समान्यतः हर मनुष्य कड़ी प्रतिस्पर्धा एवं अति व्यस्तता के कारण अपने माता पिता, बड़े बुजर्गो तथा पित्तरों की चाहे अनचाहे अनदेखा कर देता है। उसका धर्म के विरूद्ध आचरण, गुरू की पत्नी, पुत्री या अन्य स्त्री से अनैतिक सम्बन्ध, माँस मदिरा का सेवन करना, किसी को बेवजह सताना, उधार लेकर धन वापस न करना, दूसरो का धन हड़पना, झूठी गवाही देना, प्रभु, पित्तरों के नाम से दान ना देना आदि पितृ दोष के कारण बनते है। व्यक्ति के मरने के बाद इन कर्मों के कारण दोबारा जन्म लेने पर उसकी कुण्डली में पितृ दोष होता है। पितृ दोष के कारण व्यक्ति को वंशानुगत, मानसिक एवं शारीरिक घोर कष्ट प्राप्त होते है।व्यक्ति की जन्म कुण्डलीव्यक्ति की जन्म कुण्डली में उत्तम ग्रह योग होते है व्यक्ति बहुत परिश्रम भी करता है उसके घर का वास्तु भी ठीक होता है, वह धर्म का पालन भी करता है परन्तु फिर भी वह जीवन में अस्थिरता, परेशानियां, घर में बीमारी, कलह, धन की न्यूनता या खूब धनार्जन के बाद भी अत्याधिक खर्चा, अचानक अपयश, विवाह में विलम्ब आदि से पीड़ित रहता है तो इसका अर्थ है कि वे वर्तमान समय कलयुग के सबसे घातक दोष पितृ दोष से पीड़ित है।सभी धर्मों में पित्तरों को अति महत्वपूर्ण स्थानसंसार के सभी धर्मों में पित्तरों को अति महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, हिन्दू धर्म में तो पित्तरों को देवतुल्य माना गया है। आप चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले हो घर में प्रत्येक नवीन एवं शुभ कार्य में सर्वप्रथम पित्तरों का स्मरण करके उनसे आशीर्वाद लेकर ही कार्य प्रारम्भ करना चाहिए तब उस कार्य में कभी भी किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रमपितृ दोष से पीड़ित व्यक्तिपितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन शिव लिंग पर जल चढ़ाकर महामृत्यूंजय का जाप करना चाहिए । माँ काली की नियमित उपासना से भी पितृ दोष में लाभ मिलता है। कौएं तथा पीपल के वृक्ष को पित्तरों का प्रतीक माना गया है अतः मनुष्यों द्वारा रविवार को छोड़कर पीपल के जड़ में प्रतिदिन सादा जल एवं शनिवार को दूध, शहद मिश्रित जल देने से तथा कौओं को नित्य रोटी खिलाने से भी बहुत लाभ मिलता है।पितृ दोष निवारण के लियेपितृ दोष निवारण के लिये यदि कोई व्यक्ति सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर मीठा जलए मिष्ठान एवं जनेऊ अर्पित करते हुये “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाएं नमः” मंत्र का जाप करते हुये 108 परिक्रमा करे तत्पश्चात् अपने अपराधों एवं त्रुटियों के लिये क्षमा मांगे तो पितृ दोष से उत्पन्न समस्त समस्याओं का निवारण हो जाता है।

दान ना देना आदि पितृ दोष के कारण बनते है वर्तमान समय में समान्यतः हर मनुष्य कड़ी प्रतिस्पर्धा एवं अति व्यस्तता के कारण अपने माता पिता, बड़े बुजर्गो तथा पित्तरों की चाहे अनचाहे अनदेखा कर देता है। उसका धर्म के विरूद्ध आचरण, गुरू की पत्नी, पुत्री या अन्य स्त्री से अनैतिक सम्बन्ध, माँस मदिरा का सेवन करना, किसी को बेवजह सताना, उधार लेकर धन वापस न करना, दूसरो का धन हड़पना, झूठी गवाही देना, प्रभु, पित्तरों के नाम से दान ना देना आदि पितृ दोष के कारण बनते है। व्यक्ति के मरने के बाद इन कर्मों के कारण दोबारा जन्म लेने पर उसकी कुण्डली में पितृ दोष होता है। पितृ दोष के कारण व्यक्ति को वंशानुगत, मानसिक एवं शारीरिक घोर कष्ट प्राप्त होते है। व्यक्ति की जन्म कुण्डली व्यक्ति की जन्म कुण्डली में उत्तम ग्रह योग होते है व्यक्ति बहुत परिश्रम भी करता है उसके घर का वास्तु भी ठीक होता है, वह धर्म का पालन भी करता है परन्तु फिर भी वह जीवन में अस्थिरता, परेशानियां, घर में बीमारी, कलह, धन की न्यूनता या खूब धनार्जन के बाद भी अत्याधिक खर्चा, अचानक अपयश, विवाह में विलम्ब आदि से पीड़ित रहता है तो इसका अर्थ है कि वे वर...

असली नकली प्रेतावेश की पहचान प्रेत बाधित व्यक्ति में उपर्युक्त लक्षण हैं, तो समझना चाहिए कि सचमुच प्रेत कष्ट से वह पीड़ित है, अन्यथा नहीं। व्यक्ति वास्तव में प्रेतग्रस्त है और उसके माध्यम से बोलने वाला वास्तव में प्रेत है या पालतू प्रेत है, इसे समझने के लिए एक हरा और ताजा नींबू लेकर उसे प्रेतग्रस्त व्यक्ति को दिखाकर चाकू से काटें और देखें अगर पालतू प्रेत होगा तो तत्काल भाग जाएगा, नहीं तो नहीं। पितर दोषों के उपाय:- पितर दोष के लिए बृहस्पति की पूजा, पीपल ब्रहमा की पूजा तीन महीने करें। रोज प्रातः इतवार को छोड़कर दूध जल चीनी मिलाकर पीपल की जड़ में पनी डालें तथा कच्चा सूत लपेटें और जयोति जलाएं। हल्दी जैसे पीले रंग का प्रसाद बांटे, अपने बुजुर्गों की सेवा करें। लीला पुखराज नौ या बारह रत्ती का धारण करें और घर में नारायण बलि का हवन पाठ कराएं। वास्तव में पितर अपने वंशज की श्रद्धा के भूखे होते हैं, उनके द्वारा दी गई वस्तुओं के भूखे नहीं होते। श्राद्ध कर्म का मूल तत्व है, श्रद्धा। श्रद्धा और तप्रण सर्वथा निरर्थक है। कंजूसी करना अनुचित है। श्राद्धकर्ता पितरों के आशीर्वाद से धन धान्य, सुख समृद्धि, संतान और स्वर्ग प्राप्त करता है। शास्त्रों में पितृगण को देवताओं से भी अधिक दयालु और कृपालु बताया गया है। पितृपक्ष में श्राद्ध और तप्रण पाकर वे वर्ष भर तृप्त रहते हैं। जिस घर में पूर्वजों का श्राद्ध होता है वह घर पितरों द्वारा सदैव सुरक्षित रहता है। पितृपक्ष में श्राद्ध न किए जाने से पितर अतृप्त होकर कुपित हो जाते हैं जिससे व्यक्ति को अनेकों प्रकार के कष्ट और दुख उठाने पडते हैं। मृतक के लिए किए गए श्राद्ध का सूक्ष्मांश उस तक अवश्य पहुंचता है। चाहे वह किसी लोक या योनी में हों। श्राद्ध और तप्रण वंशज द्वारा बुजुर्गो पुरखों पूर्वजों को दी गई एक श्रद्धांजलि मात्र है। हमें किसी भी स्थिति में अपने इस आध्यात्मिक कर्तव्य से विमुख होकर उदासीनता नहीं बरतनी चाहिए। पितृपक्ष पुरखों पूर्वजों की स्मृति का विशेष पक्ष है। पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का जो हमारा दायित्व और धर्म है उसके लिए इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता। पितृ पक्ष की समाप्ति पर पितरों की विद- पितृ पक्ष में श्राद्ध करके पितृ अमावस्या के बाद सूर्यास्त के समय पितरों की पूर्ण आदर और श्रद्धा से विदाई अवश्य ही की जानी चाहिए । इसमें शास्त्रीय विधानानुसार सूर्यास्त के समय गंगा / नदी के तटों पर चौदह दीप प्रज्वलित कर पितरों का सिमरन करना चाहिए। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर दीपों को गंगा में प्रवाहित कर पितरों से अपनी जाने अनजाने में हुई भूलों की क्षमा माँगते हुए उनकी विदाई करें। हिन्दु धर्म में पीपल का बहुत ही प्रमुख स्थान है । पीपल में 33 करोड़ देवी देवता का वास माना गया है । भगवान वासुदेव ने भी कहा है कि वृक्षों में मैं पीपल हूँ । पीपल में हमारे पितरों का भी वास माना गया है इसलिए श्राद्ध पक्ष में तो इसका और भी ज्यादा महत्व है । बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम इसलिए गंगा / नदी तट नहीं होने की स्थिति पर पीपल के वृक्ष के चारों ओर दीप प्रज्वलित करके दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर पितरों का सिमरन करते हुए उनकी विदाई करें। वैसे तो पितृ पक्ष के श्राद्ध की महिमा अपार है इसके बारे में ज्यादा कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है , लेकिन जो भी व्यक्ति अपने दिवंगत माता-पिता, दादी -दादा, परदादा, नाना, नानी आदि का इन 16 श्राद्धों में व्रत उपवास रखकर या श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को पूर्ण श्रद्धा से भोजन कराकर दक्षिणा देते हैं,नित्य अपने पूर्वजों का तर्पण करते है उनके घर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी सदैव ही विराजमान रहती हैं। अर्थात वे सदैव ही सुख, सौभाग्य धन धान्य से परिपूर्ण रहते हैं। अत: इस धरती में सभी व्यक्तियों को इन दिनों में अपने कर्तव्यों का अवश्य अवश्य ही पालन करना चाहिए ।

  असली नकली प्रेतावेश की पहचान प्रेत बाधित व्यक्ति में उपर्युक्त लक्षण हैं, तो समझना चाहिए कि सचमुच प्रेत कष्ट से वह पीड़ित है, अन्यथा नहीं। व्यक्ति वास्तव में प्रेतग्रस्त है और उसके माध्यम से बोलने वाला वास्तव में प्रेत है या पालतू प्रेत है, इसे समझने के लिए एक हरा और ताजा नींबू लेकर उसे प्रेतग्रस्त व्यक्ति को दिखाकर चाकू से काटें और देखें अगर पालतू प्रेत होगा तो तत्काल भाग जाएगा, नहीं तो नहीं। पितर दोषों के उपाय:-  पितर दोष के लिए बृहस्पति की पूजा, पीपल ब्रहमा की पूजा तीन महीने करें। रोज प्रातः इतवार को छोड़कर दूध जल चीनी मिलाकर पीपल की जड़ में पनी डालें तथा कच्चा सूत लपेटें और जयोति जलाएं। हल्दी जैसे पीले रंग का प्रसाद बांटे, अपने बुजुर्गों की सेवा करें। लीला पुखराज नौ या बारह रत्ती का धारण करें और घर में नारायण बलि का हवन पाठ कराएं। वास्तव में पितर अपने वंशज की श्रद्धा के भूखे होते हैं, उनके द्वारा दी गई वस्तुओं के भूखे नहीं होते। श्राद्ध कर्म का मूल तत्व है, श्रद्धा। श्रद्धा और तप्रण सर्वथा निरर्थक है। कंजूसी करना अनुचित है। श्राद्धकर्ता पितरों के आशीर्वाद से धन धान्य, सुख स...